आज एक फ़िल्म देखकर आये नाम है 'शादी में जरूर आना' ...मतलब इस साल हमने जो फिल्में सिनेमा हॉल में जाकर देखी उन्ही मे से पिछली 3 फिल्मों की बात करते है...
बरेली की बर्फी
शुभ मंगल सावधान
शादी में जरूर आना
इन तीनों मूवीज में कॉमन ये हैं कि तीनों में सिर्फ प्यार के साथ साथ शादी पर भी फ़ोकस किया गया है, इन फिल्मो को देखकर लगता है कि शायद प्यार मोहब्बत वाली फिल्मों का सिनेमा थोड़ा बदल रहा है, पहले लोग बोलते थे कि ऐसा प्यार सिर्फ फिल्मों में होता है रियल लाइफ में नही लेकिन अब फिल्मों का प्यार भी रियल लाइफ जैसा हो रहा है, हम बचपन मे सुनते थे कि फिल्मों में वही दिखाते हैं जो समाज में होता है लेकिन जब बड़े हुए तब लगा ऐसा सिर्फ फिल्मों में हो होता है हीरो विलेन को मरेगा हीरोइन को मोटरसाइकिल पर बैठाकर मोटरसाइकिल उड़ाता है और पता नहीं क्या क्या,।
लेकिन इन 3 फिल्मो मे परिवार दिखता है,शादी फिक्स होने के बाद प्यार होता है सारे लोग मिडिल क्लास लोग,कोई क्लर्क, किसी का प्रिंटिंग प्रेस, किसी की मिठाई की दुकान, कोई बिजली विभाग मे, परिवार की रजामंदी से शादी होती है लड़का लडक़ी शादी फिक्स होने से लेकर शादी होने तक रोमांस करते है रोमांस मतलब रोमांस अश्लीलता नही, परिधान सारे भारतीय सूट और सारी ,shirt-trouser, नो funky ड्रेस नो कबूतर कट हेयर स्टाइल,कोई रॉयल बढ़ी कार ऑयर बंगला नही, डेट पर चाय और कॉफी,आइस क्रीम, कुल्फी होती है, बारात मे भी पल्लो लटके,मेरे यार की शादी, में निकला गड्डी लेके, और कभी कभी तो ये देश है वीर जवानों का भी जैसे गाने चल जाते है, dance भी देशी माता आ गयी टाइप का होता है,बारात बस से आती है, हल्दी ,मेहंदी ,महिला संगीत सब कुछ होता हैं, कोई न कोई नाराज़ भी होता है रिश्तेदारों मे से, शादी वाले घर में चुप चाप बड़े से लेकर युवाओ तक कि चुपचाप दारू पार्टी चलती है।छोटा शहर , कोई बड़ा रेस्टॉरेंट या मॉल नही डेट पर जाने के लिए।शेरवानी और लहंगा पसंद करने भी 20 लोग जाते है, शादी से पहले शादी के बाद की सेक्स एजुकेशन भी बिना की बलगेरिटी और फूहड़ सम्वादों के दी जाती हैं,। फिल्म में बिना अश्लीलता के कॉमेडी है कोई बिना सर-पैर के गाने नही, सब कुछ आम आदमी जैसा...मतलब ये लगता है अपनी घर की या खुद की ही शादी हो और देखो थोड़ा बहुत मेलोड्रामा तो होता है यार फ़िल्म हैं।एक बात और अगर बुरा न मानो तो तीनों फिल्मो मे परिवार पंडित/ब्राह्मण ही है जैसे बरेली की बर्फी का चिराग दुबे, शुभ मंगल सावधान का मुदित शर्मा और शादी में जरूर आना का सत्तू मिश्रा जिससे हमें भी लगा कि हम लव कम अरेंज मैरिज कर सकते है शायद फिल्मी शादियों में पंडितो को आरक्षण मिल गया है। और हां ये सिर्फ मज़ाक है दिल पर न लेना सभी धर्म और जाति और उनके प्यार ऑफ शादी बराबर ही हैं
तो मतलब ये है कि अब फिल्मे आम आदमी की हो रही है, अब फिल्मों में रियल लाइफ आ रही है अब फिल्मों का प्यार रियल मे कर सकते है और सबसे बड़ी बात ये फिल्में फैमिली के साथ बैठकर देख सकते है। तो सिनेमा अब आम हो रहा हैं तभी तो खास हो रहा है।
बरेली की बर्फी
शुभ मंगल सावधान
शादी में जरूर आना
इन तीनों मूवीज में कॉमन ये हैं कि तीनों में सिर्फ प्यार के साथ साथ शादी पर भी फ़ोकस किया गया है, इन फिल्मो को देखकर लगता है कि शायद प्यार मोहब्बत वाली फिल्मों का सिनेमा थोड़ा बदल रहा है, पहले लोग बोलते थे कि ऐसा प्यार सिर्फ फिल्मों में होता है रियल लाइफ में नही लेकिन अब फिल्मों का प्यार भी रियल लाइफ जैसा हो रहा है, हम बचपन मे सुनते थे कि फिल्मों में वही दिखाते हैं जो समाज में होता है लेकिन जब बड़े हुए तब लगा ऐसा सिर्फ फिल्मों में हो होता है हीरो विलेन को मरेगा हीरोइन को मोटरसाइकिल पर बैठाकर मोटरसाइकिल उड़ाता है और पता नहीं क्या क्या,।
लेकिन इन 3 फिल्मो मे परिवार दिखता है,शादी फिक्स होने के बाद प्यार होता है सारे लोग मिडिल क्लास लोग,कोई क्लर्क, किसी का प्रिंटिंग प्रेस, किसी की मिठाई की दुकान, कोई बिजली विभाग मे, परिवार की रजामंदी से शादी होती है लड़का लडक़ी शादी फिक्स होने से लेकर शादी होने तक रोमांस करते है रोमांस मतलब रोमांस अश्लीलता नही, परिधान सारे भारतीय सूट और सारी ,shirt-trouser, नो funky ड्रेस नो कबूतर कट हेयर स्टाइल,कोई रॉयल बढ़ी कार ऑयर बंगला नही, डेट पर चाय और कॉफी,आइस क्रीम, कुल्फी होती है, बारात मे भी पल्लो लटके,मेरे यार की शादी, में निकला गड्डी लेके, और कभी कभी तो ये देश है वीर जवानों का भी जैसे गाने चल जाते है, dance भी देशी माता आ गयी टाइप का होता है,बारात बस से आती है, हल्दी ,मेहंदी ,महिला संगीत सब कुछ होता हैं, कोई न कोई नाराज़ भी होता है रिश्तेदारों मे से, शादी वाले घर में चुप चाप बड़े से लेकर युवाओ तक कि चुपचाप दारू पार्टी चलती है।छोटा शहर , कोई बड़ा रेस्टॉरेंट या मॉल नही डेट पर जाने के लिए।शेरवानी और लहंगा पसंद करने भी 20 लोग जाते है, शादी से पहले शादी के बाद की सेक्स एजुकेशन भी बिना की बलगेरिटी और फूहड़ सम्वादों के दी जाती हैं,। फिल्म में बिना अश्लीलता के कॉमेडी है कोई बिना सर-पैर के गाने नही, सब कुछ आम आदमी जैसा...मतलब ये लगता है अपनी घर की या खुद की ही शादी हो और देखो थोड़ा बहुत मेलोड्रामा तो होता है यार फ़िल्म हैं।एक बात और अगर बुरा न मानो तो तीनों फिल्मो मे परिवार पंडित/ब्राह्मण ही है जैसे बरेली की बर्फी का चिराग दुबे, शुभ मंगल सावधान का मुदित शर्मा और शादी में जरूर आना का सत्तू मिश्रा जिससे हमें भी लगा कि हम लव कम अरेंज मैरिज कर सकते है शायद फिल्मी शादियों में पंडितो को आरक्षण मिल गया है। और हां ये सिर्फ मज़ाक है दिल पर न लेना सभी धर्म और जाति और उनके प्यार ऑफ शादी बराबर ही हैं
तो मतलब ये है कि अब फिल्मे आम आदमी की हो रही है, अब फिल्मों में रियल लाइफ आ रही है अब फिल्मों का प्यार रियल मे कर सकते है और सबसे बड़ी बात ये फिल्में फैमिली के साथ बैठकर देख सकते है। तो सिनेमा अब आम हो रहा हैं तभी तो खास हो रहा है।
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