Sunday, 18 March 2018

Khushi

आज सुबह-सुबह न्यूज पेपर में एक खबर पढ़ी की खुश रहने वाले देशों में भारत का स्थान 133 हैं क्या बात है 156 देशों में 133। लेकिन सोचने वाली बात हैं ख़ुशी है क्या? और कहाँ? कैसे मिलती हैं खुशी? सवाल बहुत हैं लेकिन जवाब शायद कुछ नहीं या फिर जवाब सवालों से ज्यादा हैं। जो भी हो मुझे एक जवाब या यूं कहें एक सवाल भरी कहानी जरूर पता हैं जो शायद सवाल जबाव में मदद करे।
ये कहानी प्यार,ममता,खुशी की हैं।  राहुल ट्वेल्थ स्टैंडर्ड का स्टूडेंट है पढ़ने में ठीक ठाक हैं राहुल के मम्मी और पापा दोनों अच्छी नॉकरी में है राहुल उनकी इकलौती संतान हैं। दोनो राहुल से बहुत प्यार करते है उसकी हर बात सर आँखों पर और राहुल भी उनकी हर बात मानता हैं।राहुल के इंटर के एग्जाम पास कर लिए अब वो और उसके दोस्त बाहर कॉलेज में एडमिशन की तैयारी कर रहे है लेकिन राहुल के पेरेंट्स ने उसे बाहर भेजने से मना कर दिया ।राहुल के सभी दोस्तों ने दूसरे शहरों में एडमिशन ले लिया लेकिन राहुल के बहुत कहने पर भी उसके पेरेंट्स ने उसे बाहर नहीं भेजा और ये कहाँ की जिसको पढ़ना होता हैं वो कही भी पढ़ लेता है और जिसको नही पढ़ना होता हैं वो किसी भी शहर मे चला जाये तो भी नहीं पढ़ेगा। राहुल ने अपने शहर के ही कॉलेज में एडमिशन ले लिया।उसके स्कूल वाले दोस्त उससे अलग हो गए  कॉलेज में नए दोस्त बने लेकिन बचपन वाले दोस्तों की बात अलग ही होती हैं। धीरे-धीरे वक़्त बीतता गया ,राहुल की ग्रेजुएशन भी कम्पलीट हो गयी ।फिर से उसने अपने घर वालो को मास्टर्स के लिए बोला लेकिन घर वालो ने उसे फिर से बाहर जाने के लिए मना कर दिया जब राहुल ने बहुत ज़िद्द की तो उन्होंने उसे समझाया", देखो राहुल हम दोनों तुम्हें बहुत प्यार करते है,तुम हमारी इकलौती सन्तान हो,और ये इतना पैसा हमने किस के लिए कमाया है तुम्हारे लिए ना, तुम क्यों नौकरी के लिए स्ट्रगल करोगे बाहर जाकर यहीं पर तुम्हें अच्छा सा बिज़नेस करवाएंगे। देखो हर आदमी कमाना पैसा ही चाहता हैं और तुम्हे आसानी से कमाने को मिल रहा हैं,"।
राहुल ने बहुत समझाया कि वो पढ़ाई लिखाई करके नौकरी से पैसा कमाना चाहता है और अगर वो बिज़नेस भी करेगा तो ट्रैंड बिज़नेस मैन की तरह। लेकिन राहुल की बातों को उसके पेरेंट्स ने अपनी इमोशनल बातों से दबा दिया और आखिर में राहुल ने अपने ही शहर में एक अच्छा सा शोरूम खोल लिया। शोरूम अच्छा चल रहा हैं लेकिन राहुल खुश नही हैं वो आगे बढ़कर पीछे रह गया था पहले स्कूल फिर कॉलेज छूटा और दोस्त भी अब उसकी जिंदगी शोरूम के केश काउंटर तक ही सिमट चुकी थी सुबह से रात तक वही एक कुर्सी उसकी ज़िदंगी । जब उसके सब दोस्त दीवाली पर अपने -अपने घर आते और मस्ती करते लेकिन राहुल त्योहार में बिज़नेस ज्यादा होने की वजह से शोरूम पर ही रहता। कुछ आगे निकल रहा था तो कुछ पीछे छूट रहा था लेकिन शायद राहुल तो थम से गया था ।
शायद पैसा उसको वो खुशी नहीं दे पा रहा था जो उससे नौकरी के लिए स्ट्रगल देती। लेकिन क्या पेरेंट्स को नही सोचना चाहिए कि सिर्फ पैसा से ही ख़ुशी दी जा सकती हैं ?क्या  पैसे भी प्यार जताने के एक तरीका हैं?  पैसा देने से अच्छा पैसा कमाना सिखाना है। बिना अपनी मेहनत और स्ट्रगल के कमाए पैसे में कुछ खास खुशी नहीं मिलती। बच्चों को संघर्ष करने दो हां लेकिन संघर्ष में उनका साथ जरूर दो हर तरह से चाहे फिर वो पैसा से ही साथ क्यों न देना पड़े, इससे सबको खुशी मिलेगी  बच्चों को भी और पेरेंट्स को भी।
और सबसे बड़ा सच पैसा जिंदगी में खुशी और सफलता का एक पैमाना तो हो सकता हैं लेकिन इकलौता नहीं।

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https://youtu.be/WWleK6ZHnmg